आज कुछ ऐसे प्रगतिशील हैं जो पाकिस्तान समर्थक नारे लगाते हैं और कुछ ऐसे देशभक्त हैं जिनकी आंखों पर देशप्रेम एक पट्टी की तरह बंधा हुआ है
देश क्या होता है? कैसे बनता है? क्यों हम देश से प्रेम करने लगते हैं? मनुष्य और माटी से हमारी मोहब्बत इतनी गहरी कैसे हो जाती है कि उसके टूटने की बात से ही हमारे भीतर भी कुछ दरकने लगता है? और फिर भी हम क्यों देश छोड़ देते हैं, कभी-कभी उसे तोड़ भी देते हैं? करीब तीन दशक पहले राजेंद्र माथुर ने अपने एक लेख में बड़ी काव्यात्मक भाषा में यही सवाल उठाया था:
देश कैसे बनता है? कैसे यह कायम रहता है? क्या ठंडे सोच-विचार से, हित-स्वार्थों की चतुर समझदारी से, राष्ट्रीयता की सही वैज्ञानिक समझ से देश जन्म लेता है और पनपता है? या देश एक जुनून है, आधी रात में देखा गया तर्कातीत सपना है, भावनाओं का अंधड़ है, इतिहास की भट्टियों में उबाली गई और जातीय स्मृतियों के सिलेंडरों में सदियों तक सिझाई गई मनपसंद शराब है? या दोनों ही बातें गलत हैं और देश विवेक और आवेश की एक संयुक्त संतान है, जिसके बारे में हम कभी यह नहीं जान सकेंगे कि उसे कितना आवेश ने गढ़ा है और कितना विवेक ने, कितना दोपहर के सूरज ने गढ़ा है और कितना आधी रात के सपने ने?
देश एक बहुत बड़ा सपना होता है जो हम लगातार देखते हैं - एक सामूहिक महास्वप्न सरीखा. लेकिन फिर इस सपने को इतना बड़ा होना चाहिए कि उसके भीतर बहुत सारे छोटे-छोटे सपने समा सकें
इसी लेख में राजेंद्र माथुर यह ज़िक्र करते हैं कि भारत और पाकिस्तान इसलिए अलग हो गए कि उनके आधी रात के सपने अलग होते चले गए, उनके जुनून अलग होते चले गए.
आज जो हालात हमारे चारों तरफ हैं, उन्हें देखकर फिर यह डर लगने लगता है कि फिर एक समाज के तौर पर हमारे सपने अलग-अलग तो नहीं होते चले जा रहे. आज कुछ ऐसे प्रगतिशील हैं जो पाकिस्तान समर्थक नारों से गुरेज़ नहीं करते और कुछ ऐसे देशभक्त हैं जिनकी आंख पर देशप्रेम एक पट्टी की तरह बंधा हुआ है और इसके आगे वे कुछ देखने को तैयार नहीं हैं - देश तक को नहीं, उन लोगों को तो कतई नहीं जो भारत में रहकर इसकी कमजोरियां बताते हैं, आलोचना करते हैं या पाकिस्तान समर्थक नारे लगाते हैं.
लेकिन ऐसे लोग आते कहां से हैं जो देश की आलोचना करते हैं या भारत में रहकर पाकिस्तान के नारे लगा पाते हैं? आखिर वे भी तो इसी देश की मिट्टी में पनपे हैं? इस मिट्टी में वह अदृश्य दीवार कौन खड़ी कर रहा है जो एक बहुत बड़ी आबादी को अपने ही देश में अजनबी और पराया बना रही है और उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले लोगों को उकसा रही है कि वे उसकी आलोचना करें और देशद्रोही नारे लगाने की आत्मघाती कार्रवाई तक करें? और जो लोग देशद्रोह के नहीं, बल्कि देशभक्ति भरे नारे लगा रहे हैं, उनमें वाकई अपने देश को लेकर कितना प्रेम है?
ऐसे लोग आते कहां से हैं जो देश की आलोचना करते हैं या भारत में रहकर पाकिस्तान के नारे लगा पाते हैं? आखिर वे भी तो इसी देश की मिट्टी में पनपे हैं?
ये कुछ असुविधाजनक सवाल हैं. इनसे मुठभेड़ करें और देशों के बारे में कुछ भ्रम तोड़ें तो सबसे पहले अपने देशद्रोही करार दिए जाने का ख़तरा उठ खड़ा होता है. लेकिन यह खतरा अगर न उठाएं तो ज़्यादा बड़ा देशद्रोह होगा. क्योंकि देश को न समझना भी तो एक तरह से देश को ख़त्म करने जैसा ही है.
तो पहली बात तो यही कि देश सिर्फ एक राजनैतिक नक्शा नहीं होता, अगर होता तो हम उससे इतने जज़्बाती तौर पर क्यों जुड़ते? तब तो उसे तोड़ना और बदलना उतना ही आसान होता जितनी आसानी से नेता पार्टियां तोड़ते हैं और जनता सरकार बदलती है. कायदे से देखें तो देशों के राजनैतिक नक्शे टूटते-फूटते रहते हैं. बीसवीं सदी के प्रारंभ और अंत का राजनैतिक नक्शा उठा कर देख लें - यह पता चलता है कि कितने राजनैतिक देश खो गए, कितने उग आए. बीसवीं सदी के शुरू में सोवियत संघ जैसा कोई राष्ट्र नहीं था और अंत में भी सोवियत संघ नहीं रहा- लेकिन पूरी बीसवीं सदी पर उसका प्रभाव इतना गहरा है कि उसके बिना इस सदी को पढ़ा ही नहीं जा सकता.
1947 के बाद भी भारत और पाकिस्तान के दोनों तरफ बहुत बड़ी आबादी ऐसी रही जिसमें एक को लाहौर-पेशावर याद आते रहे और दूसरे को अमृतसर-लखनऊ. तीन दशक पार होते-होते ढाका और चटगांव दोनों में से किसी के नहीं रह गए. वे एक तीसरे देश का हिस्सा हो गए. यानी कि राजनीतिक नक्शे बदलते रहते हैं, लेकिन इनके साथ रातों-रात हमारी वफ़ादारी बदल जाये ऐसा संभव नहीं होता. अपने अंदर बचे पुराने देश को हमें खुरच-खुरच कर हटाना पड़ता है. हम एक ज़ख़्मी और कटे हुए इतिहास की तकलीफ़ लिए जी रहे होते हैं जिससे हमारी चाल-ढाल कुछ बदल जाती है. भारत और पाकिस्तान आज की तारीख में ऐसे ही ज़ख़्मी मुल्क हैं - समय इन ज़ख़्मों को भरने की कोशिश कर रहा है, सियासत उन्हें हरा कर रही है.
यानी कि राजनीतिक नक्शे बदलते रहते हैं, लेकिन इनके साथ रातों-रात हमारी वफ़ादारी बदल जाये ऐसा संभव नहीं होता. अपने अंदर बचे पुराने देश को हमें खुरच-खुरच कर हटाना पड़ता है.
दूसरी बात यह कि देशों की कोई मूर्ति नहीं होती. जो लोग भारत माता की मूर्ति बनाते हैं, दरअसल वे अपने भीतर एक देश की छवि बनाते हैं. देशों को दरअसल उनके लोग बनाते हैं, उनके लोगों की ताकत बनाती है. वे लगातार एक बनती हुई प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं. राजनीति उनकी प्राथमिकताएं बदलती है और कई बार उनकी छवियां भी. शाह के समय का ईरान कुछ और था और सद्दाम हुसैन के समय का इराक कुछ और. हिटलर का जर्मनी अलग था, मर्केल का जर्मनी अलग है. स्टालिन का सोवियत संघ अलग था, पूतिन का रूस अलग है.
तीसरी बात यह कि देशों की एक नहीं कई छवियां होती हैं. बेशक, राजनीतिक छवि केंद्रीय होती है, लेकिन बाकी छवियां भी उनके बारे में काफी कुछ कहती हैं. कहने को अमेरिका-रूस, चीन दुनिया के सबसे बड़े और ताकतवर मुल्क हैं, लेकिन फुटबॉल का ज़िक्र आता है तो ब्राजील से बड़ा कोई नहीं दिखता है. इसी तरह क्रिकेट में एक देश न होने वाला वेस्ट इंडीज़ ऐसा देश हो जाता है जिस पर बाकी दुनिया एक दौर में निसार रहा करती थी. तब कहा करते थे कि फुटबॉल और क्रिकेट में जिनका कोई देश नहीं है, उनके ब्राजील और वेस्ट इंडीज हैं. क्रिकेट में इंग्लैंड-ऑस्ट्रेलिया दुश्मन हैं, लेकिन बाकी जगह दोस्त.
तो यह खेलों की दुनिया का बड़प्पन है जो सरहदों के पार जाकर अपनी पहचान ढूढ़ता है. यही बात संगीत और संस्कृति के बारे में कही जा सकती है. गायक और कलाकार किसी मुल्क के नहीं होते. वे हर मुल्क में सताए जाते हैं और हर मुल्क में सराहे जाते हैं. यही बात प्यार और क्रांति पर भी लागू होती है. लैला मजनूं या हीर रांझा भारतीय नहीं हैं. लेकिन हिंदुस्तान उन पर फिल्में बनाता है. महाभारत पर पीटर ब्रूक नाटक और फिल्म दोनों बना डालते हैं. चेग्वेरा पूरी दुनिया का नायक बन जाता है और वियतनाम की लड़ाई हम सबकी लड़ाई बन जाती है. भगत सिंह की शहादत के लगभग एक सदी बाद किसी पाकिस्तानी को खयाल आता है कि वह तो आज़ादी की साझा लड़ाई की विरासत का हिस्सा है, सैंडर्स के ख़ूनी के तौर पर उसका न्यायिक रेकार्ड बदला जाना चाहिए. वह केस करता है और लाहौर की एक अदालत उसे मंज़ूर भी करती है.
गायक और कलाकार किसी मुल्क के नहीं होते. वे हर मुल्क में सताए जाते हैं और हर मुल्क में सराहे जाते हैं. यही बात प्यार और क्रांति पर भी लागू होती है.
लेकिन यह तब होता है जब हम राष्ट्र या धर्म या कला या विचार को उसके उदात्त अर्थों में ले रहे होते हैं. राष्ट्र या धर्म के नाम पर जब हम राजनीति करते हैं तो अचानक खुद भी छोटे हो जाते हैं और राष्ट्र को भी छोटा कर देते हैं. विराट कोहली का कोई पाकिस्तानी फैन भारतीय झंडा फहराता है और दस साल की सज़ा झेलता है. भारत जैसे यह साबित करने पर तुला है कि वह ऐसी संकीर्णता में भी पाकिस्तान से पीछे नहीं है. यहां देश के एक बौद्धिक विश्वविद्यालय में कुछ अति उत्साही छात्र अपनी नादानी में पाकिस्तान समर्थक नारे लगाते हैं और उन्हें हमारी व्यवस्था देश का सबसे बड़ा मुजरिम - देशद्रोही - साबित करने पर तुल जाती है.
बेशक, इन नारों का कोई बचाव नहीं हो सकता - किसी राष्ट्रवादी भावुकता के तहत नहीं भी तो देश और राष्ट्र की उस विवेकसम्मत पहचान के तहत भी कि ऐसे नारे किसी भी राष्ट्रवादी परियोजना के ही मददगार होते हैं. आखिर इन पाक समर्थक नारों ने इस देश के छद्म राष्ट्रवादियों को यह मौका तो दे ही दिया कि वे देश के सबसे खुले माहौल वाले विश्वविद्यालय को देशद्रोहियों का अड्डा बताएं और उसकी बौद्धिकता का परिसर नष्ट कर दें.
उन्माद से भरी इस देशभक्ति के दौर में जो लोग जेएनयू और ऐसे ही दूसरे विश्वविद्यालयों को देशद्रोह के अड्डे बता रहे हैं, वे भूल जा रहे हैं कि एक असली भारत इन संस्थानों में पढ़ता-बढ़ता है. पिछले दो दशकों में यह प्रक्रिया बहुत तेज़ हुई है कि जो खाते-पीते तबकों के लड़के हैं, वे स्कूल के बाद सीधे आइआइटी या आईआईएम जैसे तकनीकी संस्थान या ढेर सारे निजी संस्थानों में दाखिला लेते हैं, निजी कंपनियों में नौकरी करते हैं और विदेश चले जाते हैं. उन्हें भारत की समस्याएं बहुत नहीं सालतीं. उन्हें बस ऐसा चमचमाता भारत चाहिए जिसे वे दूसरों को दिखा सकें और बता सकें कि उनका मुल्क भी तरक़्की कर रहा है.
कहने की ज़रूरत नहीं कि अगर कन्हैया कुमार और उनके साथियों ने जेएनयू में पाकिस्तान विरोधी नारे लगाए तो यह गलत भी है और भारतीय कानूनों के तहत अपराध भी.
इनके लिए देशभक्ति शोकेस में रखने वाला एक महंगा सामान होती है. दूसरी तरफ देश के जाने-पहचाने विश्वविद्यालयों में जो नई आबादी है, वह मूलतः गरीब घरों, वंचित तबकों, दलितों और पिछड़े समाजों से आ रही है. उसे यह दिखाई पड़ रहा है कि मौजूदा पढ़ाई-लिखाई उसे रोटी-रोज़गार और सुरक्षा नहीं दे रही, वह जातीय सम्मान भी नहीं दे रही जिसकी वह हकदार है. ऐसे में हैदराबाद में कोई रोहित वेमुला राजनीति करता है और मारा जाता है और जेएनयू में कोई कन्हैया कुमार वंचित तबकों के साथ अपनी नियति, अपने संघर्ष को जोड़ता है और ख़ुद को जेल में पाता है.
कहने की ज़रूरत नहीं कि अगर कन्हैया कुमार और उनके साथियों ने जेएनयू में पाकिस्तान विरोधी नारे लगाए तो यह गलत भी है और भारतीय कानूनों के तहत अपराध भी. शायद ज़्यादातर मुल्कों के कानूनों में यह अपराध होता हो. लेकिन मुल्क ऐसी गलतियों की अनदेखी करने से छोटे या कमजोर नहीं पड़ जाते. ऐसी गलतियों की अनदेखी की जाती रही है. जिन अकालियों के साथ भाजपा सरकार चला रही है, उन्होंने एक दौर में संविधान जलाया है. कश्मीर में इन दिनों हर जुमे या जुमेरात को कुछ पाकिस्तानी झंडे फहराते दिख जाते हैं. मीडिया भी इसे नज़रअंदाज़ करने लगा है और सरकार भी. क्योंकि यह एहसास है कि इसके ख़िलाफ़ ज़ोर-ज़बरदस्ती की कार्रवाई की गई तो माहौल बिगड़ेगा.
लेकिन जेएनयू में जो कार्रवाई की जा रही है, जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है, या फिर दूसरे संस्थानों में भी जो कुछ हो रहा है, उससे लगता है कि सरकार समर्थक ताकतें इन संस्थानों को उनकी असहमति के लिए दंडित कर रही हैं, उनके स्वायत्त फ़ैसलों की सज़ा दे रही हैं. कहना मुश्किल है कि ऐसी ज़ोर-जबरदस्ती से किसी को देशभक्त बनाया जा सकता है या संस्थानों को बचाया जा सकता है या नहीं.
देशों के भीतर भी धरती का यह स्वभाव होना चाहिए- इतनी सारी विविधता होनी चाहिए कि वे सुंदरता और संपूर्णता का एहसास करा सके.
जहां से बात शुरू हुई थी, वहां चलें. देश एक बहुत बड़ा सपना होता है जो हम लगातार देखते हैं - एक सामूहिक महास्वप्न सरीखा. लेकिन फिर इस सपने को इतना बड़ा होना चाहिए कि उसके भीतर बहुत सारे छोटे-छोटे सपने समा सकें. धरती इतनी बड़ी है इसलिए उसमें समंदर भी हैं और पर्वत भी. पर्वत और समंदर, सहरा और दरिया- सब एक-दूसरे से नितांत भिन्न हैं, लेकिन धरती का हिस्सा हैं और पूरी धरती को सुंदर और संपूर्ण बनाते हैं.
अगर हम कल्पना करें कि धरती बिल्कुल सपाट होती, न ऐसे ऊंचे पर्वत होते जिन पर बर्फ़ जमी होती है और न ही ऐसे गह्वर होते जिनमें समंदर समा जाता तो यह कुछ कम सुंदर, कुछ कम हरी-भरी, कुछ कम उपयोगी हो गई होती- शायद वह बनती या बचती भी नहीं.
देशों के भीतर भी धरती का यह स्वभाव होना चाहिए- इतनी सारी विविधता होनी चाहिए कि वे सुंदरता और संपूर्णता का एहसास करा सके. जाहिर है, यह रोपी हुई, सजावटी विविधता नहीं हो सकती, वह मेज पर सजा, तरह-तरह के नकली फूलों का गुलदस्ता नहीं हो सकती, इसे मिट्टी से ही अंकुरना, उगना और फैलना होगा. किसी देश में ऐसी मिट्टी सदियों की जोत-कोड़ के बाद आती है. हम खुशक़िस्मत हैं कि हमारा पास ऐसी मिट्टी है, इसलिए हम इस मिट्टी से प्यार करते हैं. जो लोग इस मिट्टी का स्वभाव बदलने की कोशिश कर रहे हैं, उनकी विचारधारा का रंग जो भी हो, लेकिन वे देशप्रेमी नहीं हैं.