जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो कुछ हुआ है उसके निहितार्थ खोजने के लिए अधिक सिर खपाने की जरूरत नहीं है. जो शक्तियां और समूह अब केन्द्र में सत्तारूढ़ राजनैतिक दल के खुले समर्थन से सक्रिय-मुखर हो रहे हैं वे सारी असहमति, विवाद, अपने से अलग विचारों और दृष्टियों को न सिर्फ असह्य बल्कि देशद्रोही मानते हैं. वे ही अब, सरकार और पुलिस की बेशर्म और खुली मदद से, यह तय करना चाहते हैं, कि हमारे लोकतंत्र में, हमारे बौद्धिक परिसरों में क्या सोचने-कहने की इजाजत है. वे ही क्या देशभक्ति है, क्या भारतीय लोकतंत्र है, क्या भारतीय परंपरा है, यह तय करेंगे और वे ही उनकी धारणाओं से अलग कुछ सोचने-करने के लिए तुरंत दंड देने या दिलवाने की कार्रवाई भी करेंगे! विचार, आस्था, कर्म ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उनके लिए यही मतलब है कि वह उन्हें मनमानी करने की छूट दे और बाक़ी सबकी स्वतंत्रता बाधित करने का असीम अधिकार.
यह सब आकस्मिक नहीं है. इसके पीछे सोची-समझी यह रणनीति है कि जितनी जल्दी हो समूचे भारत को सोच-विचार से विरत कर, भयाक्रान्त कर, उसकी बौद्धिक और सर्जनात्मक बहुलता को ध्वस्त कर, उन संस्थाओं को बदनाम कर जिनमें असहमति और अनेक विचार पलते या पल सकते हैं, एक विचार-दृष्टि की तानाशाही स्थापित कर दी जाये. आज से पहले इतने कम समय में देश की बौद्धिक संपदा को लांछित करने, उसकी संस्थाओं को लगातार अवमूल्यित करने का अभियान इतना व्यापक और आक्रामक नहीं हुआ था.
ज़ाहिर है कि इस सबको लेकर बेहद राजनैतिक सक्रियता हो रही है. यह लगभग स्वाभाविक है और लोकतांत्रिक भी. क्योंकि अब यह मुद्दा पेश है कि किस तरह का भारत, किस तरह का लोकतंत्र, किस तरह का राष्ट्र हम अपने लिए चाहते हैं. कैसी स्वतंत्रता, कितनी सभ्यता, किस तरह का न्याय होंगे. किसी राजनैतिक दल, किसी संगठन या विचारदृष्टि को इसका हक़ नहीं है कि वह इस मुद्दे को तय करें. उसे इसको लेकर छिड़ गयी बहस में शामिल होने का, अपने विचार रखने का पूरा हक़ है. पर वह यह तय नहीं कर सकता कि बहस का स्वरूप, दिशा या संभावना क्या हो.
उसे इस बात का भी हक नहीं है - भले वह सत्तारूढ़ और राजकीय शक्ति से लैस ही क्यों न हो - कि वह दूसरों को, समानता और संवाद की शर्तों पर, इस बहस में शिरकत करने से रोके या सीमित करें. विचारों के प्रति सदियों से खुला भारत आज अपने ही विचारों और बौद्धिकों-सृजनकर्मियों से डरने लगे तो ऐसा भारत बनाने वाले असली देशद्रोही माने जाने की सुपात्रता रखेंगे. उसके अनुयायी कम हैं इससे किसी विचार, आस्था या दृष्टि की वैधता या मूल्य कम नहीं हो जाते.
चौरानवे के रज़ा जो अपनी कला के लिए, अपनी कला में ही जीवित हैं
वे बहुत बूढ़े और अशक्त हो गये हैं. बिना सहारे वे चल-फिर नहीं सकते. उन्हें बोलने-सुनने में कठिनाई होती है. वे मुश्किल से चलकर अपने स्टूडियो में पहुंच पाते हैं. पर एक बार ईजल पर रखे कैनवास के सामने पहुंचते ही उनमें अजस्र सिसृक्षा (रचने की असीमित इच्छा) जाग उठती है. उनकी नज़र कम़जोर हो गयी है पर पता नहीं कैसे उनकी उंगलियां मानों आंखें बन जाती हैं और वे ब्रश से कैनवास पर बिल्कुल अप्रत्याशित रंग लगाने लगते हैं. अपने सुपरिचित संयम से, कलाकौशल से अब वे बंधे नहीं है. उन्होंने अपने लिए अब स्वतंत्रता का एक नया परिसर रच लिया है. वे अपनी शैली में सहज ही ऐसा कुछ कर रहे हैं जो अनोखा और नया है. वे सैयद हैदर रज़ा हैं जो इसी 22 फरवरी, 2016 को चौरानवे वर्ष के हो जायेंगे.
रज़ा बहुत कुछ भूल गये हैं: उनके लम्बे जीवन की कई घटनाएँ, कई जगहें और कई लोग फिर भी उन्हें याद आते रहते हैं. जैसे विस्मृति के अंधेरे में कुछ ज्योतियां कौंधती है, कुछ दीप-शिखाएं जब-तब बल उठती हैं और उनका आलोक रज़ा को अनुप्राणित कर जाता है. हालांकि रज़ा बोलने में हमेशा कम विश्वास करते रहें हैं उन्होंने तीन भाषाओं हिंदी, फ्रेंच और अंग्रेजी में कुछ लिखा है. उसका एक संचयन ‘सीईंग बियॉण्ड’ शीर्षक से प्रकाशित हो रहा है.
‘एकाग्रता, चिंतन और साधना से ही आत्मविश्वास हो सकता है’, मानने वाले इस चित्रकार ने दर्ज़ किया था कि ‘समय कम है. शब्द नहीं मिलते हैं. अतल शून्य की अनंतता को कौन समझ सकता है. इसलिए चाहता हूं... मैं न बोलूं, चित्र बोलें.’ उन्होंने भोपाल उत्सव 1978 में भाग लेने के बाद लिखा था - ‘कला रचना के लिए बड़े धैर्य की आवश्यकता है. एक निरंतर संवाद होना चाहिए, मन और जीवन के बीच, दैनिक कार्य के साथ. प्रकृति बड़ी विराट है, हमारी समझ कितनी कम. ज्ञान हमें किसी दूरी तक ले जा सकता है. फिर एक क्षण आता है जब मन आकाश में प्रकृति के दृश्य नहीं, प्रकृति ही दिखायी देती है.’
रज़ा ने यह भी लिखा है: ‘कला कर्म एक विचित्र उन्माद है. ... रूप से अतिरूप तक अनेक अपरिचित सम्भावनाएं हैं जहां सत्य छिपा है. निस्सन्देह बुद्धि, तर्क और व्यवस्थित उन्माद के शिखर पर बसी दिव्य शक्ति ही कलाकर्म का सर्वश्रेष्ठ साधन हैं.’
रज़ा इतनी उम्र में इसी अन्तर्ज्योति के विमल आलोक में सृजनरत हैं- उनका हर चित्र संसार का गुणगान, एक प्रार्थना है जो सिर्फ़ उनके ही अनूठे रंगों में सुनी-देखी जा सकती है.
इतिहास से घिरे, विरासत से बेखबर
हमारे कई कस्बे और शहर बहुत सारे इतिहास से घिरे हैं लेकिन उससे ज्यादातर बेखबर भी है. अपनी विरासत को न जानने और भूलने की हमारी परंपरा भी, लगता है, खासी लंबी है. कुछ ऐसी कि मानो भूलकर ही हम जीने का उपक्रम करते रहे हैं. पिछले सप्ताह पहली बार चन्देरी जाना हुआ. हाल के बरसों में उसका नाम वहां की साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है. लेकिन वहां बैजू बावरा की समाधि भी है, एक बड़ा कि़ला है जिस पर कभी बाबर ने हमला किया था. पास ही बूढ़ी चन्देरी में दसवीं से लेकर बारहवीं शताब्दी में बने मंदिरों और स्थापत्य के अवशेष है जिनमें से शैव-वैष्णव-जैन मूर्तियों का एक बड़ा संचयन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक सुनियोजित संग्रहालय में प्रदर्शित है. किले में खूनी तालाब है जहां कहते हैं कि बाबर के हमले के समय लगभग दो हज़ार स्त्रियों-बच्चों ने जौहर में प्राण दिये थे. पन्द्रहवीं शताब्दी में एक अफ़गान शासक ने कौशक महल नामक एक भव्य इमारत बनवायी थी, जो अपनी चौथी मंजि़ल गंवा चुकने के बावजूद कुछ विकलांग पर अत्यंत भव्य है. संग्रहालय में औसतन पचासेक लोग रोज आते हैं.
जो लोग आये उनमें से अधिकांश ने रूचि और उत्साह तो दिखाये पर लगा कि शहर में जो स्मारक आदि हैं उनकी भौतिक उपस्थिति तो है पर उनका कोई सांस्कृतिक आशय और स्मृति नहीं बचे हैं. ऐसे भव्य स्मारकों के रहते उनके बारे में युवा जिज्ञासा का कोई प्रमाण नहीं मिला. मीडिया के लोग आये पर उन्होंने लगभग सारे प्रश्न असहिष्णुता के विरूद्ध लेखकों-कलाकारों के अभियान आदि के बारे में पूछे. उन्हें न तो बैजू बावरा और ध्रुपद, उनके परस्पर संबंध के बारे में कुछ पता था, न ही उसके बारे में कोई जिज्ञासा ही उनमें थी.
शायद हमारे ऐतिहासिक शहरों में भी अब विस्मृति-विभ्रम, ग़लतफ़हमियों आदि का कचरा इस क़दर जम गया है कि उनका संस्कृति-बोध बहुत शिथिल, लगभग ग़ायब हो चुका है. उनमें आन गांव से आये तथा प्रसिद्ध हस्तियों के साथ फोटो खिंचवाने या खींचने का उत्साह तो है पर उनके माध्यम से स्वयं अपने इतिहास को याद करने या समझने की कोई कोशिश अब ज़रूरी नहीं रह गयी है. कुछ सजग नागरिकों ने इस आयोजन को बड़ा और भव्य बनाने का इरादा तो ज़ाहिर किया पर उसे लोक की बेखबरी के चलते ऐसा करने की क्या प्रासंगिकता होगी यह स्पष्ट नहीं हुआ.
यह सब आकस्मिक नहीं है. इसके पीछे सोची-समझी यह रणनीति है कि जितनी जल्दी हो समूचे भारत को सोच-विचार से विरत कर, भयाक्रान्त कर, उसकी बौद्धिक और सर्जनात्मक बहुलता को ध्वस्त कर, उन संस्थाओं को बदनाम कर जिनमें असहमति और अनेक विचार पलते या पल सकते हैं, एक विचार-दृष्टि की तानाशाही स्थापित कर दी जाये. आज से पहले इतने कम समय में देश की बौद्धिक संपदा को लांछित करने, उसकी संस्थाओं को लगातार अवमूल्यित करने का अभियान इतना व्यापक और आक्रामक नहीं हुआ था.
विचारों के प्रति सदियों से खुला भारत आज अपने ही विचारों और बौद्धिकों-सृजनकर्मियों से डरने लगे तो ऐसा भारत बनाने वाले असली देशद्रोही माने जाने की सुपात्रता रखेंगे.भारतीय राष्ट्र की अवधारणा अपने संवैधानिक रूप में हमारी पंरपराओं से चली आ रही सशक्त बहुलता को समावेशी रूप देकर बनी है. वह भारतीय जीवनदृष्टियों, विचार-सरणियों और जीवनशैलियों से जितना पोषण पाती है उतना ही भारतीय जन से भी. यह दुहराना अनावश्यक होना चाहिए कि हम एक हैं क्योंकि हम अनेक हैं. हम साथ रहे हैं क्योंकि हम हमेशा बहुवचन रहे हैं. यह समावेशिता इतनी छुई-मुई या नाजुक नहीं है कि कुछ युवाओं के कुछ सिरफिरे नारों या अपशब्दों से खतरे में पड़ या घायल-अपमानित हो जाये.
ज़ाहिर है कि इस सबको लेकर बेहद राजनैतिक सक्रियता हो रही है. यह लगभग स्वाभाविक है और लोकतांत्रिक भी. क्योंकि अब यह मुद्दा पेश है कि किस तरह का भारत, किस तरह का लोकतंत्र, किस तरह का राष्ट्र हम अपने लिए चाहते हैं. कैसी स्वतंत्रता, कितनी सभ्यता, किस तरह का न्याय होंगे. किसी राजनैतिक दल, किसी संगठन या विचारदृष्टि को इसका हक़ नहीं है कि वह इस मुद्दे को तय करें. उसे इसको लेकर छिड़ गयी बहस में शामिल होने का, अपने विचार रखने का पूरा हक़ है. पर वह यह तय नहीं कर सकता कि बहस का स्वरूप, दिशा या संभावना क्या हो.
उसे इस बात का भी हक नहीं है - भले वह सत्तारूढ़ और राजकीय शक्ति से लैस ही क्यों न हो - कि वह दूसरों को, समानता और संवाद की शर्तों पर, इस बहस में शिरकत करने से रोके या सीमित करें. विचारों के प्रति सदियों से खुला भारत आज अपने ही विचारों और बौद्धिकों-सृजनकर्मियों से डरने लगे तो ऐसा भारत बनाने वाले असली देशद्रोही माने जाने की सुपात्रता रखेंगे. उसके अनुयायी कम हैं इससे किसी विचार, आस्था या दृष्टि की वैधता या मूल्य कम नहीं हो जाते.
चौरानवे के रज़ा जो अपनी कला के लिए, अपनी कला में ही जीवित हैं
वे बहुत बूढ़े और अशक्त हो गये हैं. बिना सहारे वे चल-फिर नहीं सकते. उन्हें बोलने-सुनने में कठिनाई होती है. वे मुश्किल से चलकर अपने स्टूडियो में पहुंच पाते हैं. पर एक बार ईजल पर रखे कैनवास के सामने पहुंचते ही उनमें अजस्र सिसृक्षा (रचने की असीमित इच्छा) जाग उठती है. उनकी नज़र कम़जोर हो गयी है पर पता नहीं कैसे उनकी उंगलियां मानों आंखें बन जाती हैं और वे ब्रश से कैनवास पर बिल्कुल अप्रत्याशित रंग लगाने लगते हैं. अपने सुपरिचित संयम से, कलाकौशल से अब वे बंधे नहीं है. उन्होंने अपने लिए अब स्वतंत्रता का एक नया परिसर रच लिया है. वे अपनी शैली में सहज ही ऐसा कुछ कर रहे हैं जो अनोखा और नया है. वे सैयद हैदर रज़ा हैं जो इसी 22 फरवरी, 2016 को चौरानवे वर्ष के हो जायेंगे.
अपने सुपरिचित संयम से, कलाकौशल से अब वे बंधे नहीं है. उन्होंने अपने लिए अब स्वतंत्रता का एक नया परिसर रच लिया है. वे अपनी शैली में सहज ही ऐसा कुछ कर रहे हैं जो अनोखा और नया हैअकेले इस चौरानवे वर्ष में बनाये उनके चित्रों की तीन प्रदर्शनियां दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में आयोजित हैं. शायद ही विश्व में इतनी वय (उम्र) का कोई दूसरा कलाकार हो जो पिछले एक वर्ष मे इतने चित्र बनाकर प्रदर्शित कर रहा हो. रज़ा के यहां अब जीवन और कला के बीच की दूरी लगभग समाप्त हो चुकी है. उनके लिए जीना और चित्र बनाना अब दो नहीं एक ही संयुक्त क्रिया बन गये हैं. वे अपनी कला मे ही अपनी कला के लिए ही जीवित हैं. कला को कोई जीवन इससे अधिक दिव्य और टिकाऊ उपहार शायद ही दे सकता है.
रज़ा बहुत कुछ भूल गये हैं: उनके लम्बे जीवन की कई घटनाएँ, कई जगहें और कई लोग फिर भी उन्हें याद आते रहते हैं. जैसे विस्मृति के अंधेरे में कुछ ज्योतियां कौंधती है, कुछ दीप-शिखाएं जब-तब बल उठती हैं और उनका आलोक रज़ा को अनुप्राणित कर जाता है. हालांकि रज़ा बोलने में हमेशा कम विश्वास करते रहें हैं उन्होंने तीन भाषाओं हिंदी, फ्रेंच और अंग्रेजी में कुछ लिखा है. उसका एक संचयन ‘सीईंग बियॉण्ड’ शीर्षक से प्रकाशित हो रहा है.
‘एकाग्रता, चिंतन और साधना से ही आत्मविश्वास हो सकता है’, मानने वाले इस चित्रकार ने दर्ज़ किया था कि ‘समय कम है. शब्द नहीं मिलते हैं. अतल शून्य की अनंतता को कौन समझ सकता है. इसलिए चाहता हूं... मैं न बोलूं, चित्र बोलें.’ उन्होंने भोपाल उत्सव 1978 में भाग लेने के बाद लिखा था - ‘कला रचना के लिए बड़े धैर्य की आवश्यकता है. एक निरंतर संवाद होना चाहिए, मन और जीवन के बीच, दैनिक कार्य के साथ. प्रकृति बड़ी विराट है, हमारी समझ कितनी कम. ज्ञान हमें किसी दूरी तक ले जा सकता है. फिर एक क्षण आता है जब मन आकाश में प्रकृति के दृश्य नहीं, प्रकृति ही दिखायी देती है.’
रज़ा ने यह भी लिखा है: ‘कला कर्म एक विचित्र उन्माद है. ... रूप से अतिरूप तक अनेक अपरिचित सम्भावनाएं हैं जहां सत्य छिपा है. निस्सन्देह बुद्धि, तर्क और व्यवस्थित उन्माद के शिखर पर बसी दिव्य शक्ति ही कलाकर्म का सर्वश्रेष्ठ साधन हैं.’
रज़ा इतनी उम्र में इसी अन्तर्ज्योति के विमल आलोक में सृजनरत हैं- उनका हर चित्र संसार का गुणगान, एक प्रार्थना है जो सिर्फ़ उनके ही अनूठे रंगों में सुनी-देखी जा सकती है.
इतिहास से घिरे, विरासत से बेखबर
हमारे कई कस्बे और शहर बहुत सारे इतिहास से घिरे हैं लेकिन उससे ज्यादातर बेखबर भी है. अपनी विरासत को न जानने और भूलने की हमारी परंपरा भी, लगता है, खासी लंबी है. कुछ ऐसी कि मानो भूलकर ही हम जीने का उपक्रम करते रहे हैं. पिछले सप्ताह पहली बार चन्देरी जाना हुआ. हाल के बरसों में उसका नाम वहां की साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है. लेकिन वहां बैजू बावरा की समाधि भी है, एक बड़ा कि़ला है जिस पर कभी बाबर ने हमला किया था. पास ही बूढ़ी चन्देरी में दसवीं से लेकर बारहवीं शताब्दी में बने मंदिरों और स्थापत्य के अवशेष है जिनमें से शैव-वैष्णव-जैन मूर्तियों का एक बड़ा संचयन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक सुनियोजित संग्रहालय में प्रदर्शित है. किले में खूनी तालाब है जहां कहते हैं कि बाबर के हमले के समय लगभग दो हज़ार स्त्रियों-बच्चों ने जौहर में प्राण दिये थे. पन्द्रहवीं शताब्दी में एक अफ़गान शासक ने कौशक महल नामक एक भव्य इमारत बनवायी थी, जो अपनी चौथी मंजि़ल गंवा चुकने के बावजूद कुछ विकलांग पर अत्यंत भव्य है. संग्रहालय में औसतन पचासेक लोग रोज आते हैं.
शहर में जो स्मारक आदि हैं उनकी भौतिक उपस्थिति तो है पर उनका कोई सांस्कृतिक आशय और स्मृति नहीं बचे हैं. ऐसे भव्य स्मारकों के रहते उनके बारे में युवा जिज्ञासा का कोई प्रमाण नहीं मिला.चन्देरी शहर के बीचोंबीच हाल में इण्टैक द्वारा जीर्णोद्धार कराये राजारानी महल में अचलेश्वर महादेव मंदिर फ़ाउंडेशन और रज़ा फ़ाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में बैजू बाबरा स्मृति समारोह में एक दोपहर ‘विरासत का अर्थ’ पर बातचीत और शाम को ध्रुपद गायन आयोजित हुए. शहर में इस आयोजन के कई जगह पोस्टर लगे थे पर दोनों में ही बहुत कम लोग आए. 1983 में, जब मैं मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग में था, हमने एक ध्रुपद संध्या आयोजित की थी. तब भी उस्ताद जि़या फरीदुद्दीन खां डागर का अनुभव अच्छा नहीं था.
जो लोग आये उनमें से अधिकांश ने रूचि और उत्साह तो दिखाये पर लगा कि शहर में जो स्मारक आदि हैं उनकी भौतिक उपस्थिति तो है पर उनका कोई सांस्कृतिक आशय और स्मृति नहीं बचे हैं. ऐसे भव्य स्मारकों के रहते उनके बारे में युवा जिज्ञासा का कोई प्रमाण नहीं मिला. मीडिया के लोग आये पर उन्होंने लगभग सारे प्रश्न असहिष्णुता के विरूद्ध लेखकों-कलाकारों के अभियान आदि के बारे में पूछे. उन्हें न तो बैजू बावरा और ध्रुपद, उनके परस्पर संबंध के बारे में कुछ पता था, न ही उसके बारे में कोई जिज्ञासा ही उनमें थी.
शायद हमारे ऐतिहासिक शहरों में भी अब विस्मृति-विभ्रम, ग़लतफ़हमियों आदि का कचरा इस क़दर जम गया है कि उनका संस्कृति-बोध बहुत शिथिल, लगभग ग़ायब हो चुका है. उनमें आन गांव से आये तथा प्रसिद्ध हस्तियों के साथ फोटो खिंचवाने या खींचने का उत्साह तो है पर उनके माध्यम से स्वयं अपने इतिहास को याद करने या समझने की कोई कोशिश अब ज़रूरी नहीं रह गयी है. कुछ सजग नागरिकों ने इस आयोजन को बड़ा और भव्य बनाने का इरादा तो ज़ाहिर किया पर उसे लोक की बेखबरी के चलते ऐसा करने की क्या प्रासंगिकता होगी यह स्पष्ट नहीं हुआ.
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